Gurudev

सदगुरुदेव का जीवन परिचय

समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग जो प्रवृतिमार्गी संत व सद्गुरू है और जोधपुर स्थित धार्मिक संस्था अध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र के संस्थापक एवं संरक्षक है। सद्गुरुदेव का अवतरण 24 नवम्बर 1926 को बीकानेर के पलाना गांव में शााम 6 बजे हुआ था। लगभग 3 वर्ष से भी कम उम्र में पिता श्रीमान् नथाराम जी का देहान्त हो गया। माता श्रीमती हस्तुदेवी ने पालन पोषण कर बड़ा किया। माता स्व. श्रीमती हस्तुदेवी ने मेहनत मजदूरी करके आजीविका चलाई। बीकानेर अनाथाश्रम में रहकर पढ़ाई की। 10वीं तक शिक्षा ग्रहण की। बीकानेर भारतीय रेलवे में नौकरी लग गई। रेलवे में हैड क्लर्क के पद पर कार्य किया। पारिवारिक जिम्मेदारी शुरू से ही सद्गुरुदेव जी पर रही।
शादी धर्मपत्नी श्रीमती चुनी देवी से हुई जो जाति से सारण जाट। चार पुत्रों व एक पुत्री का जन्म हुआ। बाद में एक पुत्री तथा एक पुत्र वधू का देहान्त हो गया। रेलवे में सदैव निष्ठा व ईमानदारी से नौकरी की।
जीवन भर रोटी के लिए संघर्ष किया। विषम परिस्थितियों में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गायत्री की आराधना करनी पड़ गई। नकली भय बनाकर गायत्री की आराधना करा दी गयी। पता नहीं था आराधना से क्या लाभ होगा? अनायास ही गायत्री की सिद्धि सन् 1.01.1969 में हो गई थी। पण्डितों ने कहा कि अब तो आपको लोग खूब भेेंट पूजा व पैसे देंगे। परन्तु गुुरूदेव की आत्मा ने नहीं माना। भौतिक धन के लिए काम नहीं करने का निर्णय लिया। सोना देकर बदले में कतीर लेना उचित नहीं समझा। सद्गुरुदेव आज भी उसी सिद्धान्त पर अटल है।
स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक पढ़ने  से गुरू धारण करने की प्रेरणा मिली। योग संयोग से या अहैतूकी कृपा से आई पंथी बाबा श्री गंगाई नाथ जी योगी (ब्रह्मलीन) जामसर को अप्रेल 1983 में गुरू धारण कर लिया। बाबा ने सद्गुरुदेव को शक्तिपात दीक्षा की सामथ्र्य दे दी। 30 दिसम्बर 1983 को प्रातः 5:22 बजे बाबा श्री गंगाई नाथ जी ब्रह्मलीन हो गये। आध्यात्मिक पिता भी छोड़कर चले गये।
बाबा श्री गंगाई नाथ जी की अहैतूकी कृपा के कारण सद्गुरुदेव जी को सन् 1984 में ”कृष्ण” की सिद्धि प्राप्त हो गई। पहली बार एक ही भौतिक शरीर में गायत्री व कृष्ण की सिद्धि सद्गुरुदेव को प्राप्त हुई। सगुण साकार व निर्गुण निराकार दोनों एक ही शरीर में। तब से सद्गुरुदेव रेलवे की नौकरी से समय से साढ़े छह वर्ष पूर्व अनिवार्य सेवा निवृति लेकर मानव मात्र के कल्याणार्थ जगह – जगह शक्ति पात दीक्षा के कार्यक्रम आयोजित करने लगे। सद्गुरुदेव ने बाबा श्री गंगाई नाथ जी की नौकरी प्रारम्भ कर दी। उन्हीं के आदेश से विश्व मानव कल्याण का यह कार्य करने निकले हैं।